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एक पुरानी बहस है की जनता अपना नेता चुनते वक्त क्या देखती है, “वो जो उनकी पहचान का प्रतिनिधित्व करें ” या “वो जो धर्मनिरपेक्षता का पालन करते हुए आर्थिक विकास और सर्वांगीण प्रगतिशील समाज प्रदान करे”!

आधुनिक लोकतंत्र अधिकार और प्रतिनिधित्व के सिद्धांत पर काम करता है. कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार ने अधिकार के मोर्चे पर खूब काम किया और प्रगतिशील कानून लाएं जैसे भोजन का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार इत्यादि. इन कानूनों की मदद से यूपीए सरकार ने समग्र रूप से जनता को ज्यादा से ज्यादा अधिकार देकर मजबूत करने की कोशिश करी और प्रतिनिधित्व का वही पुराना मॉडल फॉलो किया जो दुनिया के तमाम लोकतांत्रिक देश अपनाते हैं और आज तक हिंदुस्तान ने भी अपनाया था.

नरेंद्र मोदी द्वारा विकसित हिंदुत्व का क्लोन
भारत में हिंदुत्व की राजनीति नयी नही है बल्कि ये हमेशा से थी, इसमें नई है पहचान की राजनीति. हिंदू धर्म जिंदगी जीने का तरीका है जैसे विचार से अलग मोदी की राजनीति हिंदू धर्म को एक नस्ल के तौर पर विकसित करने पर काम करती है. नरेंद्र मोदी की राजनीति में हिंदू एक धर्म नहीं बल्कि एक पहचान है और इस पहचान की खुद की एक अस्मिता है और उस अस्मिता को बचाने की एक काल्पनिक लड़ाई है जिसको नरेंद्र मोदी लड़ रहे हैं. नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीति के अनुरूप प्रतिनिधित्व के मॉडल को बदला दिया है और अधिकारों का दमन किया है. नरेंद्र मोदी के प्रतिनिधित्व के मॉडल में एक दाढ़ी रखा हुआ 56 इंच के सीने वाला आदमी हिन्दू नस्ल की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है और उसको हजारों साल के दमन से बाहर निकलकर उसका गौरव पुनर्स्थापित करना चाहता है. हिंदू नस्ल का सिद्धांत सावरकर ने दिया था और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पिछले 80 सालो से हिंदू धर्म को एक नस्ल के तौर पर विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है.

अभी भी भारतीय समाज एक पूर्ण रूप से विकसित समाज नही है इसलिए जब प्रजातंत्र के आधुनिक सिद्धान्त यहां पर लागू हुए तो कुछ नए लक्षण पैदा हुए यहां के समाज में. हिंदू धर्म के अंदर बहुत सारी जातियां हैं जिनकी खुद की पहचान है और इसी पहचान की राजनीति जेपी आंदोलन से उत्पन्न हुए तमाम राजनीतिक दल आज तक करते आ रहे हैं. इन दलों ने अपने छतरी के नीचे सभी जातियों को सत्ता में प्रतिनिधित्व देने में नाकाम हुए जिसका फायदा नरेंद्र मोदी ने उठाया है. नरेंद्र मोदी ने उन सभी लोगों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करी जो हिंदुत्व को धर्म के इतर अपनी एक पहचान की तौर पर देखते हैं और इसमें मोदी ने जातिगत प्रतिनिधत्व का भी सहारा लिया. नरेंद्र मोदी को जातिगत बैरियर लांघ कर वोट मिले क्योंकि उनके वोटर अपनी पहचान एक जाति से ऊपर उठ कर एक नस्ल के तौर पर देखते है.

भारतीय विचार पद्धति में कांग्रेस की जड़ें
भारतीय समाज में धर्म रोजाना की जिंदगी से गुथा हुआ है और एक आम भारतीय के जीवन में धर्म सुबह उठने से लेकर रात के सोने तक विभिन्न रिवाजों के रूप में उपस्थित रहता है. आप एक उदाहरण से समझिए कि दुनिया के किसी भी इस्लामिक राष्ट्र में लोकतंत्र मजबूत नहीं है, मलेशिया एकमात्र ऐसा देश है जहां पर कुछ हद तक लोकतंत्र मजबूत था पर वहां पर भी समय के साथ कमजोर होता चला गया. इस मामले में भारत एक अपवाद है जहां पर धर्म और लोकतंत्र एक साथ फलते फूलते रहें है.

कांग्रेस एक पार्टी नहीं बल्कि एक विचार है, शासन व्यवस्था की पद्धति है। कांग्रेस पार्टी ने लोकतंत्र के उन उच्च मूल्यों का भारतीय संस्करण विकसित किया है जो दुनिया के अन्य देश विकसित देश अपनी व्यवस्था में लागू करते है. विज्ञान, प्रौद्योगिकी और ग्लोबलाइजेशन के बढ़ने के साथ-साथ धर्म और नस्ल की राजनीति कमजोर होती जाएगी ये तय है. आने वाला वक्त खुले विचारों, प्रगतिशील समाज और मानवीय मूल्यों के पुनस्थापना का होगा, जिसमे धर्म पुनः जिंदगी जीने के तरीके के तौर पर स्थापित होगा. एक भारतीय के तौर पर हम सबको गर्व करना चाहिए कि हिंदू धर्म विश्व के सबसे वैज्ञानिक धर्मों में से एक है, जो अहिंसा और मानव बंधुता के उच्च सिद्धांतों को हजारों साल से लोगों के बीच में पहुंचा रहा है और आने वाले हजारों साल तक हिंदू धर्म लोगों के जिंदगी जीने के तरीके के रूप में बढ़ता और फलता फूलता रहेगा.

नस्लीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण उदाहरण पूरे इतिहास में जर्मनी में देखने को मिलता है जहां पर हिटलर ने जर्मनी वासियों को एक नस्ल के तौर पर विकसित करने की कोशिश करी थी और उसका हश्र पूरी दुनिया ने देखा है. जर्मनी की नस्लीय राजनीति को आज भी पूरी दुनिया में एक मानव निर्मित आपदा के तौर पर याद किया जाता है और जिसके लिए आज भी पूरा जर्मनी शर्मिंदा है.

(लेखक रोहन सिंह उत्तर प्रदेश कांग्रेस से जुड़े हैं और ये उनके निजी विचार हैं)